अमेरिकी खेल बिगड़ा, ट्रंप की रणनीति भारत की सख्त नीति के सामने फेल

नई दिल्ली
भारत और अमेरिका में ट्रेड डील (India-US Trade Deal) का ऐलान हो चुका है. इसका फ्रेमवर्क भी जारी किया जा चुका है और फैक्टशीट रिलीज होने के बाद इसमें अमेरिका की ओर से चुपचाप बड़ा बदलाव भी किया गया है. ये चेंज दालों (Pulses) से जुड़ा हुआ है. जी हां, भारत के साथ ट्रेड डील में अमेरिका की दाल नहीं गल पाई और भारत की रेड लाइन ने डोनाल्ड ट्रंप का पूरा खेल ही बिगाड़ दिया. आइए जानते हैं कैसे मोदी सरकार के किसानों के हित में अपना रुख अडिग रखने को साफ असर इस व्यापार समझौते में देखने को मिला है?
एग्री प्रोडक्ट पर ट्रंप की नहीं चली
सबसे पहले बात करते हैं 'दाल' को लेकर भारत की रणनीति के कामयाब होने के बारे में, तो बता दें कि बीते दिनों Donald Trump ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील के एग्जिक्यूटिव ऑर्डर पर साइन किए थे. इसके बाद दोनों देशों ने डील का फ्रेमवर्क और फैक्टशीट जारी कर दी थी. लेकिन नया मोड़ तब आया, जब अमेरिका ने इस India-US Trade Deal Factsheet में अचानक बदलाव कर दिया, जो खासतौर पर भारत के लिए राहत भरा है. दरअसल, व्हाइट हाउस ने अमेरिकी टैरिफ लिस्ट में भारतीय दालों का जिक्र ही हटा दिया. यानी इस डील में Pulses शामिल नहीं की गईं.
India-US Trade Deal की संशोधित फैक्टशीट को देखें, डील के तहत भारत द्वारा 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामानों की खरीदारी की शर्त को प्रतिबद्धता (Committed) के बजाय अब इरादा या योजना में तब्दील कर दिया गया है. मतलब ये बाध्यकारी नहीं है. वहीं US White House की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, डील के तहत लागू प्रोडक्ट कैटेगरी की लिस्ट से कृषि शब्द को हटाया गया है. कुछ वस्तुओं, जिनमें दालें भी शामिल हैं, उन्हें Tariff Cut सूची से दूर कर दिया गया है.
भारत ने पहले ही खींच दी थी Red Line
गौरतलब है कि भारत ने अबतक जिन भी देशों से व्यापार समझौते किए हैं, उनमें भारतीय कृषि और डेयरी सेक्टर को दूर रखा है. देश के किसानों के हित के साथ किसी भी तरह का कोई समझौता न करने के लिए भारत ने पहले ही रेड लाइन (Red Line) खींच रखी थी. बता दें कि भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील लंबे समय तक अटकी रहने के पीछे ये भी एक अहम कारण रहा था, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी एग्री-डेयरी प्रोडक्ट के लिए भारतीय बाजार में Tariff Free एंट्री पर अड़े हुए थे, जबकि भारत अपने रुख पर सख्ती से कायम रहा. अब इसका असर भी देखने को मिला है.
एग्री-डेयरी क्षेत्र को लेकर कैसा रहा भारत का रुख?
गौरतलब है कि भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर बातचीत शुरू होने से लेकर इसके फाइनल होने तक भारत का Agri-Dairy Sector को लेकर रुख साफ रहा है. जब अमेरिका ने अपने ऐसे प्रोडक्ट्स को भारतीय बाजार में एंट्री दिलाने के लिए दबाव बढ़ाया था, तो बीते साल जुलाई महीने में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दो-टूक कह दिया था. भारत किसी दबाव में नहीं आएगा और अपने मूल हितों खासतौर पर किसानों के हित से समझौता कतई नहीं करेगा.
उन्होंने कहा था कि 'Nation First हमारा मूल मंत्र है और किसी भी तरह की कोई बातचीत दबाव में नहीं होगी. भारतीय किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए ही बातचीत की जाएगी. अब India-US Trade Deal का ऐलान होने के बाद भी उन्होंने साफ किया है कि इस समझौते से भारत के किसानों और उनकी खेती को किसी भी तरह का नुकसान नहीं होगा. इसमें कोई भी ऐसा उत्पाद शामिल नहीं है, जो भारतीय किसानों की आजीविका या देश की कृषि को प्रभावित कर सके.
पीयूष गोयल ने भी बताया क्या-क्या डील से बाहर?
शिवराज सिंह चौहान के अलावा केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी ट्रेड डील के ऐलान और फ्रेमवर्क जारी होने के बाद कहा था कि यह समझौता किसानों के हितों की सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका को बनाए रखने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है. मक्का, गेहूं, चावल, सोया, पोल्ट्री, दूध, पनीर, एथेनॉल (ईंधन), तंबाकू, कुछ सब्जियां और मांस जैसे संवेदनशील कृषि व डेयरी उत्पादों को पूरी तरह संरक्षित रखा गया है.
सबसे बड़ा उत्पादक, आयातक भी भारत
सिर्फ दालों के लिहाज से देखें, तो भारत विश्व में दलहन का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और आयातक है और लगातार इस सेक्टर में आत्मनिर्भरता पर जोर देता रहा है. बीते कुछ वित्तीय वर्षों में उत्पादन के आंकड़े देखें, तो रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में दाल उत्पादन 2022–23 में 26 मिलियन टन के करीब, 2023–24 में लगभग 24 मिलियन टन और 2024–25 में 25–27 मिलियन टन के बीच रहा है.
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक सबसे बड़े उत्पादक राज्य हैं. वहीं भारत कई देशों में दाल का निर्यात भी करता रहा है. इनमें बांग्लादेश, नेपाल, UAE, श्रीलंका, अमेरिका और कनाडा सबसे ऊपर रहे हैं. आयात की बात करें, तो 2024-25 में रिकॉर्ड 73 लाख टन दालों का इंपोर्ट किया गया था, जो घरेलू खपत का करीब 15% से अधिक था.



