जांजगीर-चांपा: ‘उधार’ की कप्तानी और बढ़ता अपराध, क्या गुपचुप के जायके में उलझी है जिले की सुरक्षा?

जांजगीर-चांपा। जिले की कानून व्यवस्था इन दिनों चर्चाओं में है, लेकिन वजह कोई बड़ी कामयाबी नहीं, बल्कि पुलिस कप्तानी को लेकर उठ रहे सवाल हैं। जिले को बीते 45 दिनों से ‘उधार’ की एसपी के तौर पर नवेदिता पाल मिली हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि एक तरफ जिले में अपराध का ग्राफ बढ़ रहा है और बड़ी घटनाएं सामने आ रही हैं, वहीं दूसरी ओर पुलिसिंग का मैदानी असर नजर नहीं आ रहा। चेंबर से दूरी, जायके से नजदीकी!
सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, जिले में गंभीर आपराधिक घटनाएं होने के बावजूद पुलिस अधीक्षक के तेवर सख्त नजर नहीं आ रहे हैं। शिकायत है कि एसपी साहिबा का चेंबर से नाता कम ही जुड़ पा रहा है। वहीं, शहर के बाजारों में उन्हें ‘गुपचुप और चाट’ का लुत्फ उठाते हुए अक्सर देखा जा रहा है। जनता के बीच चर्चा है कि जब जिले का मुखिया ही फील्ड पर पसीना बहाने के बजाय बाजार के जायके में मशगूल दिखे, तो मातहतों से मुस्तैदी की उम्मीद कैसे की जाए?
अपराध दर पर उठते सवाल
जांजगीर-चांपा जैसे संवेदनशील जिले में 45 दिनों का समय किसी भी अधिकारी के लिए क्षेत्र को समझने और अपनी धाक जमाने के लिए पर्याप्त होता है। बावजूद इसके:
बड़ी घटनाओं पर अंकुश लगाने में पुलिस सुस्त नजर आ रही है।
अपराधियों में खाकी का खौफ कम होता दिख रहा है।
आम जनता खुद को असुरक्षित महसूस कर रही है।
बड़ा सवाल: क्या एक जिले की सुरक्षा व्यवस्था को ‘पार्ट-टाइम’ या ‘कैजुअल’ नजरिए से सुधारा जा सकता है? अगर एसपी का ध्यान चेंबर और क्राइम मीटिंग्स के बजाय मार्केट की सैर-सपाटे पर रहेगा, तो जिले की क्राइम रेट को कम करने की उम्मीद बेमानी लगती है।
जनता की उम्मीदों पर पानी
एक तरफ सरकार बेहतर पुलिसिंग के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ जांजगीर-चांपा में पुलिसिंग के इस ‘लापरवाह’ अंदाज ने शासन की छवि पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में क्या व्यवस्था में कोई सुधार होता है या फिर जिला इसी तरह ‘उधार’ और ‘उपेक्षा’ की मार झेलता रहेगा।



