राष्ट्रीय

भारत-चीन रिश्तों में क्यों आई खटास? पूर्व राजनयिक अशोक सज्जनहार ने तिब्बत और दलाई लामा को बताया अहम मुद्दा

नई दिल्ली
 एक दौर था जब 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के नारे दिए जाते थे। आज के समय में परिस्थिति बिल्कुल बदल चुकी है। दोनों ही देशों के संबंध काफी खराब हो चुके हैं। आखिर ऐसी क्या वजह रही जिसके कारण दोनों देशों के रिश्ते ऐसे हो गए कि सात वर्षों के बाद चीन के राष्ट्रपति अपने पड़ोसी देश की यात्रा पर आए। ऐसा कहा जाता है कि दोनों देशों के संबंधों में खटास की शुरुआत दलाई लामा की वजह से होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि दलाई लामा (Dalai Lama) ने दुनिभर के मंचों से तिब्बत की आवाज बुलंद की है। यह बात चीन को रास नहीं आती है।

यूट्यूबर शुभांकर मिश्रा के साथ एक पॉडकास्ट के दौरान भारत के पूर्व डिप्लोमैट रिटायर आईएफएस ऑफिसर अशोक सज्जनहार ने इस मुद्दे को विस्तार से समझाया है। जब उनसे पूछा गया कि क्या तिब्बत के कारण से भारत और चीन के संबंध बिगड़े हैं तो उन्होंने विस्तार से जवाब दिया है। उन्होंने कहा, भारत-चीन के रिश्ते पहले ऐसे नहीं थे। तिब्बत कभी भी चीन का हिस्सा नहीं था। 1954 में एक समझौते के तहत चीन ने इसे हथिया लिया। आज भी वह अरुणाचल प्रदेश के एक बड़े हिस्से को तिब्बत का बताकर उसपर अपना अधिकार जमाने की कोशिश करता है।

इसके पीछे के कारणों के समझाते हुए उन्होंने कहा कि जब-जब चीन की आर्थिक स्थिति मजबूत होती जाती है, तब-तब वह अपनी विस्तारवाद की नीति को बढ़ावा देता है। आज के समय में चीन की जीडीपी भारत की तुलना में पांच गुना अधिक है।

असुरक्षित महसूस करता है चीन
अशोक सज्जनहार कहते हैं कि- दोनों देशों के बीच तिब्बत एक मसला है। भारत ने दलाई लामा को पनाह दी हुई है। चीन दलाई लामा को अलगाववादी नेता मानता है। चीन का मानना है कि दलाई लामा तिब्बत को चीन से अलग करना चाहते हैं। जबकि दलाई लामा ने साफ शब्दों में कहा है कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं है। दलाई लामा बस चाहते हैं कि उनकी सभ्यता, संस्कृति और भाषा को संरक्षित किया जाए जो कि ऐसा हो नहीं हो रहा है। चीन तिब्बत की पहचान को ही खत्म करना चाहता है चीन। दलाई लामा इसका विरोध कर रहे हैं। चीन खुद को लेकर बहुत असुरक्षित महसूस करता है। इसलिए वह विस्तारवाद की नीति अपनाए हुए है।

जिनपिंग और मोदी में क्या हुई बात?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात को लेकर उन्होंने कहा कि यह समय की मांग थी और तीनों ही देशों को इसकी जरूरत थी। जब उनसे पूछा गया कि जब बड़े कार्यक्रमों में दुनिया के दिग्गज नेताओं की मुलाकात होती है तो कैसा माहौल होता है। उन्होंने समझाते हुए कहा- जब कार्यक्रम की शुरुआत होती है तो होस्ट ओपनिग स्टेटमेंट देता है। इसके बाद आगंतुकों को बुलाया जाता है। मुद्दों पर निर्भर करता है कि आखिर माहौल कैसा होता है। सामान्य रूप से तो दोनों देशों के मंत्रियों और अधिकारियों के स्तर पर आपसी सहमति बन जाती है। अगर उनसे कुछ मुद्दों का समाधान नहीं हो पाता है तो दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्ष उसपर बात करते हैं और समाधान निकालने की कोशिश करते हैं। उसमें सियासी पहलुओं पर भी ध्यान देना पड़ता है

उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि अगर ट्रंप जैसे नेताओं के साथ बैठक होती हैं तो उस दौरान कुछ भी हो सकता है। सामान्यत: बैठक काफी शांति माहौल में होती है। मुद्दों को सुलझाने की कोशिश की जाती है।

डिनर में क्यों नहीं आए जिनपिंग?
शी जिनपिंग की यात्रा पर उन्होंने कहा कि डिनर में नहीं आना सामान्य बात है। वह थके हुए थे। वह उसी दिन आए और सीधे ही भारत मंडपम गए। उन्हें आराम का मौका नहीं मिला। दिनभर मीटिंग चलती रही। मैसेजिंग देने की बात होती तो चीन की तरफ से कुछ न कुछ कहा जाता। अगर ऐसा होता तो वह भारत की यात्रा पर ही नहीं आते।

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Back to top button