150 साल पुराना रेलवे रूट होगा इतिहास? अंग्रेजों के जमाने की गलती सुधारने की तैयारी में रेलवे

नईदिल्ली
सौ बात की एक बात ये कि एक ख़बर ऐसी आई है जो 150 साल पहले की ग़लती सुधार रही है और इतने सारे लोगों पर असर डालती है लेकिन उस पर ज़्यादा ध्यान नहीं गया पब्लिक का. क्योंकि दिल्ली-मुंबई रूट पर चलने वाले लोगों का ध्यान नहीं जाता कि दिल्ली से मुंबई जाने वाली ट्रेनें मथुरा और रतलाम की तरफ़ क्यों निकल पड़ती हैं? दिल्ली मुंबई का ट्रेन का रास्ता UP-MP होते हुए गुजरात क्यों जाता है? ये असल में 150 साल से ऐसा ही चल रहा है, लेकिन अब बदलने वाला है. नया प्लान तैयार हो गया है. तो ख़बर तो आई दिल्ली से जयपुर की नई रेल लाइन की लेकिन ध्यान नहीं गया लोगों का इस तरफ़. चक्कर क्या है कि रेल की लाइनें बनीं थी ज़्यादातर अंग्रेज़ों के टाइम में. और उसके बाद से उन्हीं का विस्तार किया जाता रहा. बिजली की लाइन बिछा दी, ट्रैक डबल कर दिये, जहां मीटर गेज थे वहां भी ब्रॉड गेज कर दिये, लेकिन सब उन्हीं रास्तों पर होता रहा जो ज़्यादातर अंग्रेज़ बना कर छोड़ गए थे. नई बिल्कुल ख़ाली ज़मीन पर रेल लाइनें बहुत ही कम बिछाई गईं।
अब दिल्ली से जयपुर की बिल्कुल फ़्रेश नई रेल लाइन बिछाई जाने वाली है बिल्कुल नए रास्ते से. और इसका दिल्ली-मुंबई रूट पर भी आगे असर पड़ सकता. क्योंकि क्या है कि दिल्ली से जयपुर की अभी जो रेल लाइन है वो है क़रीब 305 km की. दिल्ली से रेवाड़ी से अलवर से बांदीकुई होते हुए जयपुर जाती है ट्रेन. नक़्शे पर आप देखो तो ये दिल्ली से जयपुर का सीधा रास्ता नहीं है. लेकिन पुराने ज़माने से यही रूट चला आ रहा है. इसी वजह से दिल्ली से मुंबई के ट्रेन के रास्ते में जयपुर अजमेर वगैरह नहीं आते. ट्रेन दिल्ली से मथुरा निकल जाती है और फिर कोटा से रतलाम से वडोदरा से सूरत होते हुए मुंबई जाती है. ये पड़ता 1384 km, जबकि अगर आप नक़्शा देखो तो जो बीच के शहरों को जोड़ता हुआ दिल्ली-मुंबई का ट्रेन का रूट होना चाहिए था वो होना चाहिए था दिल्ली से रेवाड़ी से जयपुर से अजमेर से अहमदाबाद होते हुए मुंबई. वो रास्ता पड़ता 1150 km, तो वो रास्ता क्यों नहीं बना दिल्ली-मुंबई का ट्रेन रूट जबकि वो छोटा पड़ता. तो उसकी दो बड़ी वजहें थीं।
क्या थी अंग्रेजों की 150 साल पुरानी गलती
एक तो थी एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक ग़लती जो एक अंग्रेज़ वाइसरॉय ने कर दी थी 150 साल पहले. एक ग़लती से पूरा राजस्थान कई मायनों में पिछड़ गया था. वो ग़लती क्या थी? तो हुआ क्या था कि ट्रेन तो भारत में बहुत ही पहले आ गई थी. अंग्रेज़ ले आए थे अपना राज मज़बूत करने के लिए. और 1853 में भारत में रेल आ गई थी. और वो थी ब्रॉड गेज की रेल. ब्रॉड गेज मतलब पटरियों के बीच की दूरी होती है 1.67 मीटर. उसी हिसाब से उतने ही चौड़े डब्बे उन पर चलते हैं. अभी जो ट्रेनें चल रही हैं वो वही ब्रॉड गेज हैं. और एक जो पहाड़ों पर शिमला दार्जीलिंग वगैरह में छोटी वाली ट्रेनें चलती हैं वो होती हैं नैरो गेज, उनकी पटरियों के बीच की दूरी होती है 1 मीटर से भी कम. लेकिन ज़्यादातर मैदानी इलाक़ों में अंग्रेज़ ब्रॉड गेज की ही लाइन बिछा रहे थे. लेकिन फिर एक अंग्रेज़ वाइसरॉय आए लॉर्ड मेया नाम के. उन साहब ने बोला कि बहुत ख़र्चा हो रहा है तो रेलवे की लाइन मीटर गेज की बिछाओ. मीटर गेज मतलब पटरियों के बीच में 1 मीटर की दूरी. यानी ब्रॉड गेज से कम और नैरो गेज से ज़्यादा. और दिल्ली से रेवाड़ी के बीच में पहली मीटर गेज की लाइन बिछाई गई 1873 में।
मीटर गेज की ट्रेनें कैसी होती हैं?
तो मीटर गेज की जो ट्रेनें होती थीं वो कम चौड़ी होती थीं. अभी जो स्लीपर कोच होता है जो साइड बर्थ होती है वो वाला हिस्सा मीटर गेज में नहीं होता था. तो अंग्रेज़ वाइसरॉय लॉर्ड मेयो ने उस टाइम मीटर गेज का फ़रमान सुना दिया. और उस टाइम राज-रजवाड़ों के साथ मिलकर राजस्थान वाले इलाक़े की लाइनें बिछ रही थीं. रजवाड़े भी अपनी रेल लाइनें बिछा रहे थे. तो राजस्थान साइड में बिछ गई मीटर गेज की लाइनें. अहमदाबाद तक. बाद में फिर ब्रॉड गेज पर आ गए अंग्रेज़. तो दिल्ली-मुंबई के रूट पर राजस्थान से ट्रेन ही नहीं जा सकती थी. क्योंकि ऐसा तो हो नहीं सकता था कि यहां से कम चौड़ी वाली ट्रेन में बैठो और जयपुर अजमेर आबू रोड होते हुए अहमदाबाद तक जाओ और वहां पर ट्रेन चेंज करो क्योंकि वहां से आगे पटरी चौड़ी थी. तो दिल्ली मुंबई का रूट ही इधर मथुरा कोटा रतलाम का बन गया क्योंकि दिल्ली-चैन्नई का रूट भी इधर से ही जा रहा था. एक तो वजह ये थी. लेकिन जब बाद में 90 का दशक आते-आते सारी लाइनें ब्रॉड गेज कर दी गईं तब भी दिल्ली-मुंबई का रूट जयपुर अजमेर वाला इसलिए नहीं बना क्योंकि दिल्ली से जयपुर का रूट ही सीधा नही था, वो घुमा कर लंबा था 305 km का. जबकि नक़्शे पर आप देखो तो दूरी 200 km की भी नहीं है दिल्ली से जयपुर की।
मोदी सरकार सुधारने जा रही अंग्रेजों की गलती
अब सरकार बिलकुल ही नई लाइन बिछाने जा रही है दिल्ली से जयपुर. ये होगी 191 km की. ये लाइन जाएगी दिल्ली से रेवाड़ी से नीमराना से बहरोड़ से कोटपूतली से शाहपुरा होते हुए जयपुर. यानी लगभग उस रूट से जिससे सड़क जाती है. इस रास्ते से दिल्ली-जयपुर की दूरी लगभग 100 किलोमीटर कम हो जाएगी और टाइम 1.5 घंटा कम लगेगा. तो अंग्रेज़ों के ज़माने में सीधा रास्ता क्यों नहीं बनाया गया था जयपुर का? क्योंकि उस टाइम रेल लाइन बिछाई गई थी सांभर झील से नमक लाने के लिए. नमक एक बुहत ही अहम आइटम होता था उस टाइम. जयपुर के पास सांभर झील के पानी से नमक निकाला जाता था और अंग्रेज़ उस नमक को अपने हिसाब से जगह-जगह पहुंचाना चाहते थे. इसलिए लाइन को अलवर और बांदीकुई वाले रूट से ले जाया गया था जो उस वक़्त की रियासतों को सूट करता था. इसी लंबे रास्ते की वजह से दिल्ली से मुंबई जाने के लिए भी ये वाला रास्ता कभी ट्रेन का रास्ता नहीं बन पाया .क्योंकि मथुरा, कोटा और वडोदरा होकर जाने वाले रूट से जयपुर-अजमेर-अहमदाबाद होकर जाने वाला रास्ता लंबा पड़ता है, क्योंकि दिल्ली-जयपुर का हिस्सा ही ज्यादा घुमावदार है।
नए रूट से आपको होगा फायदा
अब ये नया छोटा रास्ता बनने से न सिर्फ दिल्ली-जयपुर की यात्रा में कम टाइम लगेगा, बल्कि जयपुर से आगे अहमदाबाद और मुंबई की दिशा में भी ट्रेनों के लिए बेहतर और तेज विकल्प मिल सकता है. सोचिए, 150 साल पहले जो ग़लती एक अंग्रेज़ वाइसरॉय कर गया था वो ढोए जा रहे थे हम. अभी ट्रेन से दिल्ली से जयपुर जाने में लगते हैं 4 घंटे एक्सप्रेस ट्रेनों से. वो नए रूट से लगने चाहिए 2 से 2.5 घंटे. दो घंटे में दिल्ली से जयपुर का मतलब है जयपुर भी एक तरह से दिल्ली से पूरी तरह जुड़ जाएगा और दिल्ली में कारोबार और दफ़्तर वगैरह जाने के लिए भी लोग नीमराना तक तो रह ही सकते हैं, जयपुर से भी दिल्ली आकर उसी दिन शाम तक वापस भी जा सकते हैं. और दिल्ली-मुंबई का ये रूट आगे चल कर बन जाए तो अजमेर और अहमदाबाद तक बीच के राजस्थान के सारे इलाक़े की ट्रेनें ही नहीं, विकास की गाड़ी भी रफ़्तार पकड़ सकती है. इतनी बड़ी ख़बर है ये. यात्रिगण कुपया ध्यान दें. सौ बात की एक बात।




