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कन्हाईबंद कोल डिपो विवाद: विरोध या व्यापारिक वर्चस्व की जंग? नीरज सिंह के समर्थन में उठे सवाल—दूरी 2 किमी, फिर प्रदूषण का शोर क्यों?

जांजगीर-चाम्पा: नवागढ़ ब्लॉक के ग्राम कन्हाईबंद में प्रस्तावित कोल डिपो को लेकर छिड़ा विवाद अब एक नया मोड़ लेता दिख रहा है। सामने आई नई जानकारियों के अनुसार, नीरज सिंह की जिस भूमि का विरोध किया जा रहा है, वह गांव की घनी बस्ती से करीब 2 किलोमीटर दूर स्थित है। ऐसे में प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के नाम पर किए जा रहे विरोध के पीछे अब ‘व्यापारिक प्रतिशोध’ की बू आने लगी है।
दोहरा मापदंड: पुराने डिपो पर चुप्पी, नए पर आपत्ति क्यों?
हैरानी की बात यह है कि जिस रेलवे कोयला साइडिंग के पास नीरज सिंह की भूमि है, वहां पहले से ही एक विशाल कोल डिपो संचालित हो रहा है। ग्रामीणों के जिस ‘विशेष वर्ग’ द्वारा नीरज सिंह का विरोध किया जा रहा है, उन्हीं लोगों का संरक्षण उस पुराने कोल डिपो को प्राप्त है।
यह सवाल उठना लाजिमी है कि:

  • अगर पुराने कोल डिपो से ग्रामीणों को कोई समस्या नहीं है, तो 2 किमी दूर स्थित नीरज सिंह की भूमि पर आपत्ति क्यों?
  • क्या यह विरोध केवल इसलिए है ताकि क्षेत्र में किसी नए व्यक्ति का प्रवेश न हो और एक ‘विशेष वर्ग’ का एकाधिकार बना रहे?
    साजिश या जनहित?
    नीरज सिंह के समर्थकों का कहना है कि यह पूरा विरोध प्रायोजित है। चूंकि भूमि रेलवे साइडिंग के बिल्कुल करीब है, इसलिए यह व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसी महत्व को देखते हुए कुछ प्रभावशाली लोग नहीं चाहते कि यहां कोई नया डिपो खुले। विरोधियों द्वारा लगाए गए ‘शासकीय भूमि’ या ‘गलत शपथ पत्र’ के आरोप केवल प्रशासन पर दबाव बनाने और मामले को लटकाने की एक सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है।
    तथ्यों के आधार पर पक्ष:
  • पर्याप्त दूरी: गांव से 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित होने के कारण रिहायशी इलाके में धूल या प्रदूषण फैलने की आशंका तकनीकी रूप से बहुत कम है।
  • क्षेत्रीय विकास में बाधा: रेलवे साइडिंग के पास औद्योगिक गतिविधियों से क्षेत्र का विकास होता है, लेकिन व्यक्तिगत लाभ के लिए इसे ‘विवादित’ बनाया जा रहा है।
  • प्रतिशोध की राजनीति: सूत्रों का मानना है कि यह विरोध जनहित में कम और निजी खुन्नस निकालने के लिए ज्यादा किया जा रहा है, ताकि एक विशेष वर्ग को फायदा पहुंचाया जा सके।
    न्याय की उम्मीद
    नीरज सिंह का पक्ष स्पष्ट है कि वे प्रशासन के हर नियम को मानने के लिए तैयार हैं और उन्होंने सभी दस्तावेज पारदर्शिता के साथ जमा किए हैं। अब गेंद जिला प्रशासन और खनिज विभाग के पाले में है कि वे इस ‘सुनियोजित विरोध’ के पीछे के सच को पहचानें और तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लें।
    निष्कर्ष: क्या कन्हाईबंद का यह विरोध वाकई ग्रामीणों की चिंता है या फिर ‘कोल सिंडिकेट’ के बीच अपना वर्चस्व बचाने की एक लड़ाई? यह जांच का विषय है।
    ब्यूरो रिपोर्ट: के भारत न्यूज़

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