मध्य प्रदेश

दो साल में 128 प्रोजेक्ट पूरे करने का टारगेट, सिंहस्थ तैयारी में खर्च होंगे 3,000 करोड़

उज्जैन 

प्रदेश सरकार ने आगामी सिंहस्थ महापर्व को भव्य, सुरक्षित और सुव्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से बजट में बड़े पैमाने पर वित्तीय प्रावधान किए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सिंहस्थ क्षेत्र के समग्र विकास और आधारभूत संरचना को मजबूत करने के लिए कुल 13 हजार 851 करोड़ रुपये के विभिन्न कार्य स्वीकृत किए गए हैं। ये राशि पिछले बजट की तुलना में 1055 करोड़ रुपए ज्यादा है। अब तक सरकार सिंहस्थ के लिए 5570 करोड़ रुपए का बजटीय प्रावधान कर चुकी है।वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने अपने बजट भाषण में जिक्र किया कि सिंहस्थ के लिए पहले से ही 13 हजार 851 करोड़ के काम स्वीकृत किए जा चुके हैं। अलग-अलग विभागों के काम चल भी रहे हैं।

वित्त मंत्री के दावों के उलट सरकार के ही आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया है कि घाटों की मरम्मत, पुल, सड़कों के अपग्रेडेशन का काम अभी भी पूरा नहीं हुआ है।आयोजन के लिए बनी कैबिनेट सब कमेटी अब तक 10 विभिन्न विभागों के 128 प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दे चुकी है, जिनकी कुल अनुमानित लागत ₹13,752 करोड़ है। इनमें सबसे ज्यादा 42 प्रोजेक्ट नगरीय विकास एवं आवास विभाग के जिम्मे हैं। जिनमें 33 प्रोजेक्ट पर ही काम शुरू हुआ है।

इन परियोजनाओं का मुख्य फोकस यातायात व्यवस्था को सुगम बनाना, श्रद्धालुओं की आवाजाही को सुरक्षित करना और शहर की कनेक्टिविटी को बेहतर करना है। स्वीकृत कार्यों में 1,164 करोड़ रुपये की लागत से इंदौर-उज्जैन मार्ग का सिक्स लेन चौड़ीकरण, 1,370 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से इंदौर-उज्जैन ग्रीनफील्ड हाईवे का निर्माण तथा 701 करोड़ रुपये की लागत से उज्जैन बायपास मार्ग का विकास शामिल हैं। इन परियोजनाओं के पूर्ण होने से सिंहस्थ के दौरान लाखों श्रद्धालुओं की आवाजाही में सुविधा होगी और ट्रैफिक दबाव कम होगा।

वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए इन कार्यों हेतु 3 हजार 60 करोड़ रुपये का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है, जिससे निर्माण कार्यों को गति मिल सके। सरकार का लक्ष्य है कि सिंहस्थ महापर्व के दौरान देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर सड़क नेटवर्क, सुगम परिवहन, सुव्यवस्थित प्रवेश मार्ग और सुरक्षित आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराई जा सके।

सरकार का मानना है कि इन आधारभूत परियोजनाओं से न केवल सिंहस्थ की व्यवस्थाएं सुदृढ़ होंगी, बल्कि उज्जैन और आसपास के क्षेत्रों के दीर्घकालीन शहरी विकास को भी नई दिशा मिलेगी। 

समय कम, काम ज्यादा- 26 प्रोजेक्ट अभी कागजों में

सिंहस्थ 2028 के शुरू होने में अब महज दो साल का वक्त बचा है, लेकिन स्वीकृत 128 प्रोजेक्ट्स में से केवल 102 पर ही काम शुरू हो पाया है। इसका मतलब है कि 26 महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट अभी भी फाइलों में ही अटके हैं। इन लंबित योजनाओं में सड़कें चौड़ी करने, नए पुलों का निर्माण, घाटों का विस्तार, ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार, श्रद्धालुओं के लिए आवास जैसे प्रोजेक्ट हैं।

साथ ही पेयजल और सीवरेज लाइनों जैसी मूलभूत सुविधाओं का काम भी अभी पूरा नहीं हुआ है। योजनाएं जितनी बड़ी और महत्वपूर्ण हैं, उन्हें पूरा करने के लिए समय उतना ही कम बचा है, जो प्रशासनिक मशीनरी के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

हाल ही में मुख्य सचिव अनुराग जैन की अध्यक्षता में हुई विभागीय समीक्षा बैठक में यह बात सामने आई कि प्रदेश में पूंजीगत व्यय की सर्वाधिक 2300 करोड़ रुपए की राशि सिंहस्थ मद में ही बची हुई है, जिसे जल्द से जल्द खर्च करने की आवश्यकता है।

नगरीय विकास एवं आवास विभाग पर सिंहस्थ की तैयारियों का सबसे बड़ा जिम्मा है। नगरीय विकास विभाग, जिस पर सिंहस्थ की तैयारियों का सबसे बड़ा जिम्मा है, को 2760 करोड़ रुपए की लागत वाले 42 प्रोजेक्ट पूरे करने हैं। लेकिन विभाग अब तक केवल 33 प्रोजेक्ट ही धरातल पर उतार पाया है।

शिप्रा का शुद्धिकरण: सरकार की सबसे बड़ी चुनौती

सिंहस्थ की आत्मा शिप्रा नदी के पवित्र जल में स्नान से जुड़ी है, और सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती करोड़ों श्रद्धालुओं को स्वच्छ और निर्मल जल उपलब्ध कराना है। जल संसाधन विभाग इस दिशा में पांच बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है, लेकिन उनकी प्रगति की रफ्तार चिंताजनक है।

    कान्ह डायवर्शन क्लोज डक्ट: इंदौर से आने वाले कान्ह नदी के प्रदूषित पानी को शिप्रा में मिलने से रोकने के लिए यह ₹914 करोड़ की सबसे महत्वपूर्ण परियोजना है। सितंबर 2027 की डेडलाइन वाले इस प्रोजेक्ट का काम अब तक केवल 52% ही पूरा हो पाया है।

    बैराज निर्माण: शिप्रा और कान्ह नदी पर पानी के बहाव को नियंत्रित करने के लिए बैराज बनाए जा रहे हैं। इंदौर में काम 75% पूरा हो चुका है, लेकिन उज्जैन में यह केवल 20% और देवास में महज 5% ही हुआ है।

    शिप्रा को प्रवाहमान बनाना: सेवरखेड़ी-सिलारखेड़ी प्रोजेक्ट के तहत ₹614.53 करोड़ की लागत से शिप्रा को प्रवाहमान बनाने का काम चल रहा है, जो अभी 62% ही पूरा हुआ है।

    घाट निर्माण: शिप्रा के दोनों ओर 30 किलोमीटर के क्षेत्र में ₹776 करोड़ की लागत से घाटों का निर्माण होना है, लेकिन यह काम अभी केवल 20% ही आगे बढ़ा है।

    शिप्रा पर अतिरिक्त बैराज: उज्जैन और देवास जिले में शिप्रा पर बनने वाले अन्य बैराजों का काम भी केवल 15% ही हुआ है, जबकि इनकी डेडलाइन नवंबर 2027 है।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में इन प्रोजेक्ट्स की समीक्षा कर काम में तेजी लाने के सख्त निर्देश दिए हैं।

केंद्र से मदद की उम्मीद इस महा-आयोजन के वित्तीय बोझ को कम करने के लिए राज्य सरकार पिछले तीन साल से केंद्र से मदद की गुहार लगा रही है। हालांकि केंद्रीय बजट में सीधे तौर पर कोई घोषणा नहीं हुई, लेकिन राज्य सरकार को उम्मीद है कि केंद्र से किस्तों में 6,000 से 7,000 करोड़ रुपए की राशि प्राप्त होगी।

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