राष्ट्रीय

होर्मुज में भारतीय जहाज पर हमले के बीच भारत भेज रहा है 3000 जवान, 10 जेट और 5 वॉरशिप, अमेरिका-चीन की चिंता बढ़ी

नई दिल्ली

भारत और रूस की दोस्‍ती दशकों पुरानी है. न जाने कितने झंझावात आए और गए, पर दोनों देशों की दोस्‍ती मजबूत पिलर की तरह अडिग रही. ईरान जंग और होर्मुज जंग के बीच अब दोनों परंपरागत मित्र देश ने एक ऐसा फैसला किया है, जिससे अमेरिका और चीन जैसे देशों के माथे पर पसीना आना तय है. भारत और रूस एक-दूसरे की जमीन पर सेना के जवानों की तैनाती करने पर सहमत हो गए हैं. तीन हजार जवानों के अलावा 10 मिलिट्री एयरक्राफ्ट और 5 युद्धपोत भी दोनों देश एक-दूसरे के क्षेत्र में तैनात कर सकेंगे. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, पूरी दुनिया सुरक्षा चिंता के अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है. पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने इस चिंता को और भी बढ़ा दिया है, ऐसे में भारत और रूस की ओर से उठाया गया यह कदम अपने आप में ऐतिहासिक है. ऐसे वक्‍त में जब दुनियाभर में दशकों से चली आ रही सहयोग की भावना दरक रही है, दो मित्र देशों के बीच इस तरह की रक्षा साझेदारी परस्‍पर विश्‍वास का बेहतरीन उदाहरण है। 

भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग को नई मजबूती देने वाले एक अहम समझौते के तहत अब दोनों देश एक-दूसरे की जमीन पर 3000 तक सैनिक, सीमित संख्या में नौसैनिक जहाज और सैन्य विमान तैनात कर सकेंगे. यह व्यवस्था ‘इंडो-रशियन रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट’ (RELOS) के तहत लागू हुई है, जिस पर फरवरी 2025 में भारत और रूस के बीच हस्ताक्षर हुए थे और यह इस साल 12 जनवरी से प्रभावी है. रूस ने इस समझौते को दिसंबर 2025 में औपचारिक रूप से मंजूरी दी थी. रूस की आधिकारिक कानूनी इंफॉर्मेशन पर प्रकाशित जानकारी के अनुसार, इस समझौते के तहत दोनों देश एक-दूसरे के क्षेत्र में एक समय में अधिकतम पांच युद्धपोत, दस सैन्य विमान और 3,000 सैनिकों की तैनाती कर सकते हैं. यह तैनाती पांच वर्षों की अवधि के लिए होगी, जिसे आपसी सहमति से आगे भी बढ़ाया जा सकता है. रूसी संसद की अंतरराष्ट्रीय मामलों की समिति के प्रथम उपाध्यक्ष व्याचेस्लाव निकोनोव (First Deputy Chairman of International Affairs Committee Vyacheslav Nikonov) ने इस प्रावधान की पुष्टि की है। 

दोनों देशों को मिलेंगी कई सुविधाएं
इस समझौते के लागू होने से दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक सैन्य सहयोग को नई दिशा मिलने की उम्मीद है. खासतौर पर भारत के पास मौजूद रूसी मूल के सैन्य उपकरणों की सर्विसिंग और लंबी अवधि की तैनाती में यह समझौता बेहद उपयोगी साबित होगा. इसके अलावा यह समझौता संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और मानवीय सहायता अभियानों को भी कवर करता है. RELOS समझौता केवल सैन्य तैनाती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें लॉजिस्टिक सहयोग का भी विस्तृत प्रावधान है. इसके तहत मेजबान देश युद्धपोतों को बंदरगाह सेवाएं (Port Services), मरम्मत सुविधा, पानी, भोजन और अन्य तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराएगा. वहीं, सैन्य विमानों के लिए एयर ट्रैफिक कंट्रोल, उड़ान से जुड़ी सूचनाएं, नेविगेशन सिस्टम का उपयोग, पार्किंग और सुरक्षा जैसी सुविधाएं शामिल होंगी. ईंधन, लुब्रिकेंट्स और तकनीकी मरम्मत जैसी सेवाएं भुगतान के आधार पर प्रदान की जाएंगी। 

सामरिक साझेदारी को मजबूती
समझौते के तहत दोनों देशों को एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों, जैसे एयरबेस और बंदरगाहों, तक पारस्परिक पहुंच भी मिलेगी. इससे भारत को रूस के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण आर्कटिक क्षेत्र के ठिकानों तक पहुंच मिलेगी, जबकि रूस को भारत के सैन्य ढांचे का व्यापक उपयोग करने का अवसर मिलेगा. यह समझौता संयुक्त प्रशिक्षण, आपदा राहत और संभावित संयुक्त अभियानों के लिए भी मार्ग प्रशस्त करता है, जिससे दोनों देशों की सामरिक साझेदारी और मजबूत होगी। 

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