डायबिटीज महामारी का रूप ले रही है भारत में, 10 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित, कौन सा राज्य सबसे आगे?

नई दिल्ली
डायबिटीज किसी भी उम्र में हो सकती है. आजकल, बिजी लाइफस्टाइल, खराब खान-पान की आदतों और एक्सरसाइज की कमी के कारण, डायबिटीज से पीड़ित लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए सही खान-पान बहुत जरूरी है. कुछ लोग मोटापे, वजन बढ़ने या ज्यादा तनाव जैसे कारणों से इस बीमारी का शिकार हो जाते हैं. एक बार डायबिटीज हो जाने पर, व्यक्ति को जीवन भर इसके साथ जीना पड़ता है. यह एक जेनेटिक बीमारी है जो समय के साथ और बिगड़ती जाती है।
भारत में, डायबिटीज की समस्या अब एक महामारी का रूप ले चुकी है. भारत को अब अक्सर 'डायबिटीज कैपिटल ऑफ वर्ल्ड' कहा जाता है. इसी संबंध में, इस खबर में जानें कि भारत के किस राज्य में डायबिटीज के सबसे ज्यादा मरीज हैं और इसके पीछे क्या कारण हैं…
भारत के किस राज्य में डायबिटीज के सबसे ज्यादा मरीज हैं?
द लैंसेट डायबिटीज एंड एंडोक्रिनोलॉजी (जून 2023) में प्रकाशित ICMR-INDIAB के एक डिटेल्ड स्टडी के अनुसार, भारत में 10 करोड़ से ज्यादा लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, और सबसे ज्यादा डायबिटीज रेट वाला राज्य गोवा है, जहां 26.4 प्रतिशत से ज्यादा आबादी इस बीमारी से प्रभावित है. इसके बाद, ज्यादा दर वाले अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पुडुचेरी, तमिलनाडु, केरल, पंजाब और चंडीगढ़ शामिल हैं. 2025 के एक और विश्लेषण से पता चलता है कि डायबिटीज के लिए सबसे ज्यादा 'आयु-मानकीकृत प्रसार दर' (ASPR) तमिलनाडु में है, जिसके बाद गोवा और कर्नाटक का नंबर आता है. नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया 2023–2025 की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे कम डायबिटीज दर वाला राज्य उत्तर प्रदेश (4.8 प्रतिशत) है।
इस मुद्दे पर डॉक्टर का क्या कहना है?
SPARSH हॉस्पिटल, यशवंतपुर, बैंगलोर के इंटरनल मेडिसिन और डायबेटोलॉजी के कंसल्टेंट डॉ. अशोक एम. एन का कहना है कि गोवा में डायबिटीज की दर सबसे ज्यादा बताई गई है, जो लाइफस्टाइल, खान-पान की आदतों और जनसांख्यिकी से जुड़े अलग-अलग फैक्टर्स के मिले-जुले असर को दिखाता है. बहुत ज्यादा शहरी आबादी, आराम पसंद लाइफस्टाइल, और ज्यादा कार्बोहाइड्रेट, चीनी और शराब वाली डाइट, ये सभी इस बढ़ती समस्या की वजह हैं. इसके अलावा, गोवा में बेहतर स्क्रीनिंग और हेल्थ के बारे में ज्यादा जागरूकता जैसे कारण भी दूसरे इलाकों के मुकाबले डायबिटीज का पता लगाने की ज्यादा दर की वजह हो सकते हैं।
डॉ. अशोक एम. एन ने आगे कहा कि केरल, तमिलनाडु, दिल्ली और पंजाब जैसे कुछ राज्यों में भी डायबिटीज की बीमारी में बढ़ोतरी देखी गई है. इन इलाकों में भी शहरीकरण, कम फिजिकल एक्टिविटी और बढ़ता मोटापा जैसे रिस्क फैक्टर्स मौजूद हैं. कई मामलों में, तनाव, सोने-जागने के अनियमित चक्र और आनुवंशिक प्रवृत्तियों के कारण यह खतरा और भी बढ़ जाता है. एक और बड़ी चिंता युवाओं में डायबिटीज के बढ़ते मामले हैं, जिसका मुख्य कारण कम उम्र से ही अनहेल्दी लाइफस्टाइल और खराब खान-पान की आदतों को अपनाना है. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि डायबिटीज अक्सर शुरुआती फेज में पता नहीं चल पाता, जिससे शरीर के अंदर गंभीर जटिलताएं चुपचाप पनपने लगती हैं. इस समस्या से निपटने के लिए निवारक स्वास्थ्य देखभाल पर जोर देना जरूरी है, जिसमें नियमित जांच, स्वस्थ खान-पान की आदतों के बारे में जागरूकता, अधिक फिजिकल एक्सरसाइज और समय पर चिकित्सकीय हस्तक्षेप शामिल है. हालांकि किसी इलाके की ज्योग्राफिकल लोकेशन भी डायबिटीज की मौजूदगी पर असर डाल सकती है, लेकिन लाइफस्टाइल ही सबसे अहम फैक्टर बनी हुई है।
National Institutes of Health (.gov) के अनुसार, एक्सपर्ट्स विशेष रूप से गोवा और दक्षिणी राज्यों में डायबिटीज की हाई रेट का श्रेय खराब लाइफस्टाइल, एनवायरमेंटल फैक्टर्स और सोशियो इकोनॉमिक फैक्टर के मेल को जिम्मेदार मानते हैं, जिनमें शामिल है…
हाई रेट ऑफ ओबेसिटी: भारत में डायबिटीज का सबसे आम कारण मोटापा है. नेचर जनर्ल में प्रकाशित ICMR-INDIAB के अध्ययन से पता चलता है कि जिन क्षेत्रों में डायबिटीज का प्रसार अधिक है, वहां अक्सर पेट और सामान्य मोटापे की दरें भी अधिक होती हैं. ये ऐसे फैक्टर्स हैं जिनका टाइप 2 डायबिटीज से गहरा संबंध होता है।
लाइफस्टाइल में बदलाव या अर्बनाइजेशन: गोवा और तमिलनाडु जैसे राज्य बहुत ज्यादा शहरीकृत (Highly Urbanized) हैं, इसके कारण लोगों की लाइफस्टाइल में निष्क्रियता बढ़ी है, फिजिकल एक्टिविटी कम हुई है, और हाई कैलोरी वाले, प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन बढ़ा है।
खान-पान की आदतें: खान-पान की आदतों में बदलाव (विशेष रूप से रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और चीनी का अत्यधिक सेवन) 'मेटाबॉलिक सिंड्रोम' के बढ़ते मामलों का एक प्रमुख कारण है. दरअसल, यह सिंड्रोम विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का एक ग्रुप है, जो मिलकर टाइप 2 डायबिटीज, हार्ट डिजीज और स्ट्रोक के खतरे को काफी हद तक बढ़ा देता है।
जेनेटिक संवेदनशीलता: कई अध्ययनों से पता चलता है कि अन्य आबादी की तुलना में, भारतीयों में आमतौर पर डायबिटीज होने की जेनेटिक प्रवृत्ति अधिक होती है, साथ ही उनमें 'इंसुलिन प्रतिरोध' का लेवल भी अधिक होता है।
आर्थिक रूप से डेवलप राज्यों में, 'नॉन कम्युनिकल डिजीज' (NCDs) (जैसे कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर) की रेट लाइफस्टाइल में बदलावों के कारण बढ़ी हुई दिखाई देती हैं. इसी वजह से केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में ये आंकड़े विशेष रूप से हाई हैं. इन क्षेत्रों में आमतौर पर बेहतर हेल्थ केयर इंफ्रास्ट्रक्चर और हाई लेवल ऑफ पब्लिक अवेयरनेस होता है. इसके चलते, कम आय वाले और कम शहरीकृत राज्यों की तुलना में यहां ज्यादा संख्या में मामलों की पहचान की जाती है और उनकी रिपोर्ट की जाती है..
डायबिटीज के मरीजों को किन चीजों से परहेज करना चाहिए?
डायबिटीज के मरीजों को नमक का सेवन कम करना चाहिए. नॉन-वेज खाना, डेयरी प्रोडक्ट्स, आइसक्रीम, नारियल का तेल और चिकन में फैट ज्यादा होता है. अगर आपको डायबिटीज है, तो आपको फास्ट फूड और तली-भुनी चीजों से दूर रहना चाहिए. आपको नाश्ते में उपमा, बोंडा, वड़ा या पूरी नहीं खानी चाहिए. डॉ. श्रद्धेय कटियार ने अपने ट्विटर (X) हैंडल पर डायबिटीज के मरीजों के लिए 31 सबसे खराब चीजों की एक लिस्ट शेयर की है, जो इस प्रकार है…
| आटा या मैदा | उबला आलू | कम फैट वाली मिठाइयां |
| बिस्कुट | अनानास | स्किम्ड दूध |
| रस्क | तरबूज | प्रोटीन बार |
| मैरी बिस्कुट | शहद | आम |
| दलियां | सूजी इडली/चीला | मुरमुरे |
| साबूदाना | बेसन चीला | चपाती |
| ओट्स | पास्ता | पपीता |
| ओट्स मिल्क | नूडल्स | चॉकलेट |
| ब्रेड (किसी भी तरह की) | फ्रेंच फ्राइज | फ्लेवर्ड दही |
| केला | आलू के चिप्स | केक और कुकीज |
| अरबी (Taro) |
डायबिटीज और ब्लड शुगर के बीच का अंतर समझें
ज्यादातर लोग डायबिटीज और ब्लड शुगर को एक ही चीज मान लेते हैं, लेकिन इन दोनों में काफी अंतर है. ब्लड शुगर का मतलब है खून में ग्लूकोज का लेवल, जो हमारी खाने-पीने की आदतों के हिसाब से बदलता रहता है. दूसरी तरफ, डायबिटीज तब होती है जब शरीर इंसुलिन बनाना बंद कर देता है या जब इंसुलिन ठीक से काम नहीं कर पाता. इंसुलिन एक हार्मोन है जो शरीर को ब्लड शुगर (ग्लूकोज) को सेल्स तक पहुंचाने में मदद करता है, जिससे उन्हें एनर्जी मिलती है. जब इंसुलिन ठीक से काम नहीं करता, तो ब्लड शुगर का लेवल बढ़ जाता है, जिससे डायबिटीज हो जाती है. डायबिटीज के मामले में, 200 mg/dL से ज्यादा ब्लड शुगर का लेवल गंभीर माना जाता है. 200 mg/dL से ज्यादा का लेवल हाई ब्लड शुगर, या हाइपरग्लाइसेमिया का संकेत देता है।
medlineplus.gov पर दी गई जानकारी के मुताबिक, उम्र के अनुसार नार्मल ब्लड शुगर लेवल को इस चार्ट के माध्यम से जानें.
यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि नॉर्मल ब्लड शुगर लेवल किसी व्यक्ति की उम्र और शारीरिक स्थिति के आधार पर अलग-अलग होता है. इन लेवल को समझने से आपको यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि आपका ग्लूकोज लेवल हेल्दी रेंज में है या नहीं. यहां, उम्र के आधार पर नॉर्मल फास्टिंग और रैंडम ब्लड शुगर लेवल के बारे में जानें…
| एज ग्रुप | फास्टिंग ब्लड शुगर लेवल (mg/dL) | रैंडम ब्लड शुगर लेवल (mg/dL) | इम्पोर्टेन्ट नोट्स |
| शिशु या छोटे बच्चे (0-3 वर्ष) | 60-110 | 60-180 | ब्लड शुगर का स्तर ऊपर-नीचे हो सकता है. खाली पेट (Fasting) का स्तर आमतौर पर 60 से 110 mg/dL के बीच होता है. खाना खाने के बाद, रैंडम ब्लड शुगर का स्तर थोड़ा ज्यादा हो सकता है. |
| बच्चे (3-12 वर्ष) | 70-140 | 70-180 | इसका लेवल शिशु या छोटे बच्चे के मुकाबले थोड़ा ज्यादा होता है. इस पर नजर रखना बहुत जरूरी है, खासकर अगर परिवार में किसी को डायबिटीज की हिस्ट्री रही हो |
| किशोर (13-18 वर्ष) | 70-140 | 70-180 | टीनएज के दौरान, हार्मोनल बदलाव ग्लूकोज लेवल पर असर डाल सकते हैं. डेवलपमेंट के दौरान टेम्पररी इंसुलिन रेजिस्टेंस बन सकता है. |
| एडल्ट (19+ वर्ष) | 70-130 | 70-180 | ब्लड शुगर का स्तर अधिक स्थिर रहता है. प्रीडायबिटीज या टाइप 2 डायबिटीज से बचने के लिए, खाली पेट ब्लड शुगर का स्तर 130 mg/dL से अधिक नहीं होना चाहिए. |




