लखनऊ समेत छह जिलों के लिए सरफेस वाटर ग्रिड परियोजना को मंजूरी मिली

लखनऊ
उत्तर प्रदेश राज्य राजधानी क्षेत्र (यूपी एससीआर) के तहत सरफेस वाटर ग्रिड परियोजना को भी शासन से मंजूरी मिल गई है। प्रमुख सचिव आवास पी. गुरुप्रसाद की अध्यक्षता में विभिन्न विभागों की बैठक में इस परियोजना को हरी झंडी दी गई है।
योजना के तहत गंगा और घाघरा नदी का पानी पाइपलाइन के माध्यम से लखनऊ, उन्नाव, बाराबंकी, रायबरेली, सीतापुर और हरदोई तक पहुंचेगा, इससे छह जिलों को लंबे समय तक जल सुरक्षा उपलब्ध होगी।
यूपी एससीआर क्षेत्र की बढ़ती आबादी, नई टाउनशिप, औद्योगिक निवेश और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए परियोजना तैयार हो चुकी है। एलडीए उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार ने बताया इसका उद्देश्य भूजल पर निर्भरता कम कर जल स्रोतों के माध्यम से टिकाऊ पेयजल व्यवस्था विकसित करना है।
परियोजना के पहले चरण में बाराबंकी, लखनऊ और उन्नाव को जोड़ने वाली करीब 120 से 130 किलोमीटर लंबी बल्क वाटर ट्रंक पाइपलाइन बिछाई जाएगी। बाराबंकी क्षेत्र में घाघरा नदी और उन्नाव क्षेत्र में गंगा नदी प्रमुख जल स्रोत है। इन नदियों से पानी लेकर अलग-अलग पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए छह जिलों तक पहुंचाया जाएगा।
पहले चरण में 1500 एमएलडी क्षमता के वाटर इंटेक और वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित होंगे। विभिन्न स्थानों पर 200, 300 और 500 एमएलडी क्षमता के आधुनिक संयंत्र लगाए जाएंगे, जहां नदी के पानी को शुद्ध कर शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाया जाएगा।
दूसरे चरण में बनेगा क्षेत्रीय जल रिंग नेटवर्क
परियोजना के दूसरे चरण में छह जिलों को जोड़ने वाला विशाल क्षेत्रीय सर्कुलर जल ग्रिड विकसित किया जाएगा। इसकी बड़ी विशेषता बैकअप आपूर्ति व्यवस्था होगी। किसी एक मार्ग पर तकनीकी खराबी या आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में दूसरे मार्ग से पानी की सप्लाई जारी रखी जा सकेगी।
यूपी एससीआर क्षेत्र की लगभग 80 प्रतिशत पेयजल आपूर्ति भूजल स्रोतों से हो रही है। 2026 में क्षेत्र की कुल जल मांग 2663 एमएलडी आंकी गई है, जिसमें से 2138 एमएलडी पानी भूजल से मिल रहा है। सतह के जल की हिस्सेदारी केवल 525 एमएलडी है।
अधिकारियों का मानना है कि तेजी से बढ़ते निर्माण कार्य, नई आवासीय योजनाओं और औद्योगिक विकास के कारण यह व्यवस्था भविष्य में टिकाऊ नहीं रह पाएगी। विशेषज्ञों के अनुसार 2051 तक यूपी एससीआर क्षेत्र की कुल जल मांग बढ़कर 4100 एमएलडी तक पहुंच सकती है। इसको ध्यान में रखते हुए परियोजना की क्षमता भविष्य में 1500 एमएलडी से बढ़ाकर 2700 एमएलडी तक करने का प्रविधान किया गया है।



