UPI पेमेंट पर लगेगा कम MDR चार्ज? IIT बॉम्बे की स्टडी ने सुझाया नया मॉडल, अब सरकार के फैसले पर नजर

नई दिल्ली
IIT बॉम्बे की एक स्टडी में UPI पेमेंट सिस्टम को चलाने के लिए मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR घटाने, बैंकों को इससे मिलने वाला हिस्सा खत्म करने और बड़े कारोबारियों से डिजिटल पेमेंट फीस लेने जैसे सुझाव दिए गए हैं। चाय की दुकान हो या शॉपिंग मॉल, सब्जी वाला हो या ऑनलाइन शॉपिंग, UPI ने पैसे देने का तरीका बदल दिया है. मोबाइल निकाला, QR कोड स्कैन किया और पेमेंट हो गया. लेकिन इस सुविधा को चलाने वाले पेमेंट ऐप, बैंक और दूसरे सर्विस प्रोवाइडर्स का खर्च कौन उठाएगा, यह सवाल अहम हो गया है. IIT बॉम्बे के प्रोफेसर आशीष दास और RBI की पूर्व अधिकारी प्रज्ञा दास की स्टडी UPI at a Crossroads: Reintroducing the MDR में इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की गई है।
MDR घटाकर 0.08% करने का सुझाव
स्टडी में UPI के कुछ मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर MDR की दर मौजूदा घोषित 0.40 फीसदी से घटाकर 0.08 फीसदी करने की सिफारिश की गई है. इसके साथ ही पेमेंट सिस्टम में अलग-अलग कंपनियों और बैंकों की हिस्सेदारी को नए सिरे से तय करने का सुझाव दिया गया है. स्टडी की प्रमुख सिफारिशों के मुताबिक PhonePe और Google Pay जैसे थर्ड पार्टी ऐप प्रोवाइडर्स पर 0.06 फीसदी MDR लगाया जाए. वहीं पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स जिसमें मुख्य रूप से बैंक शामिल हैं, उनकी सेवाओं के लिए 0.02 फीसदी हिस्सा दिया जाए. इसके साथ ही MDR से मिलने वाली रकम में बैंकों को मिलने वाला हिस्सा खत्म करने का सुझाव भी दिया गया है।
बैंकों की CASA कमाई से चले UPI सिस्टम
स्टडी में बैंकों को MDR का हिस्सा देने पर सवाल उठाया गया है. इसकी वजह करंट अकाउंट और सेविंग्स अकाउंट यानी CASA में जमा पैसे से बैंकों को मिलने वाला ब्याज मार्जिन है. रिपोर्ट के मुताबिक कारोबारी साल 2025-26 में बैंकों का CASA डिपॉजिट से नेट इंटरेस्ट मार्जिन 4.85 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा रहा. स्टडी का तर्क है कि बैंकों को UPI सिस्टम को चलाने और बेहतर बनाने के लिए इसी स्रोत से योगदान देना चाहिए।
क्या सुझाव दिए गए?
IIT बॉम्बे की स्टडी में CASA डिपॉजिट से जुड़े फंड का करीब 3 फीसदी, यानी लगभग 15,000 करोड़ रुपये, UPI सिस्टम के लिए इस्तेमाल करने का प्रस्ताव दिया गया है. वहीं UPI को बैंकिंग कारोबार के लिए जरूरी सर्विस बनाने की सिफारिश भी की गई है. इसके साथ ही डिजिटल पेमेंट सिस्टम के रखरखाव और विस्तार के लिए बैंकों की जिम्मेदारी तय करने का सुझाव भी दिया गया है।
स्टडी में ये भी कहा गया है कि UPI सिस्टम को चलाने का खर्च निकालने के लिए बड़े कारोबारियों की भूमिका बढ़ाई जा सकती है. इसके लिए सालाना 50 करोड़ रुपये या उससे ज्यादा टर्नओवर वाले कारोबारियों के लिए UPI पेमेंट स्वीकार करना अनिवार्य बनाने का सुझाव दिया गया है. स्टडी के मुताबिक ऐसे कारोबारियों से ऑनलाइन मर्चेंट पेमेंट पर उचित डिजिटल पेमेंट फीस ली जा सकती है।
स्टडी की बाकी सिफारिशें
IIT बॉम्बे की स्टडी में कहा गया है कि UPI के लिए एड-वैलोरम यानी ट्रांजैक्शन की रकम के अनुपात में चार्ज तय किया जाए और इसकी अधिकतम सीमा 40 रुपये प्रति ट्रांजैक्शन रखी जाए. वहीं क्रेडिट कार्ड MDR घटाने पर विचार किया जाए जिससे डिजिटल पेमेंट के अलग-अलग तरीकों के बीच चार्ज का अंतर कम हो जाए. इसके साथ ही ATM से मुफ्त कैश निकालने की तय सीमा पर दोबारा विचार करने की बात स्टडी में कही गई है. उधर पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड को जारी रखने का जिक्र किया गया है जिससे नए कारोबारियों को डिजिटल पेमेंट सिस्टम से जोड़ने में मदद मिल सकेगी. IIT बॉम्बे की स्टडी डिजिटल पेमेंट सिस्टम की कमाई और खर्च के बंटवारे पर बहस को आगे बढ़ाती है. अंतिम फैसला सरकार और संबंधित नियामकों का होगा. आम लोगों के लिए चुनौती यही है कि UPI की सुविधा बनी रहे और इसे चलाने का खर्च भी टिकाऊ तरीके से पूरा हो सके।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
सबसे अहम सवाल है कि क्या UPI पेमेंट करने पर आम लोगों को भी चार्ज देना पड़ेगा. स्टडी का मकसद डिजिटल पेमेंट सिस्टम के खर्च को टिकाऊ तरीके से पूरा करना है. इसमें आम लोगों के रोजमर्रा के पेमेंट पर सीधे चार्ज लगाने की सिफारिश नहीं की गई है. 15 सितंबर 2026 को घोषित सरकारी व्यवस्था के मुताबिक, चुनिंदा मर्चेंट UPI ट्रांजैक्शन पर 0.40 फीसदी MDR तय किया गया था. हालांकि ये चार्ज कारोबारियों पर लागू किया जाएगा और ग्राहकों पर इसका बोझ नहीं डाला जा सकता है. इसके अलावा पर्सन टू पर्सन के बीच होने वाले पेमेंट और तय छूट वाली श्रेणियां भी इससे बाहर हैं।
15 अक्तूबर की डेडलाइन से मिलेगी छूट!
फिनटेक कंपनियां और कारोबारी इस सिस्टम को लागू करने की तारीख आगे बढ़ाकर जनवरी 2027 किए जाने की मांग कर रहे हैं. कई कारोबारी संगठनों का कहना है कि नियम पूरी तरह साफ किए बिना इसे लागू करना मुश्किल होगा. इंडस्ट्री की सबसे बड़ी चिंता अलग-अलग तरह के ट्रांजैक्शन पर अलग नियमों को लेकर है. इसकी वजह है कि UPI का सिस्टम कार्ड पेमेंट की तुलना में ज्यादा जटिल माना जा रहा है क्योंकि यूटिलिटी पेमेंट के लिए अलग नियम हैं. वहीं लोन रिपेमेंट के लिए अलग व्यवस्था है और कैपिटल मार्केट ट्रांजैक्शन की अलग कैटेगरी है।
शेयर बाजार से जुड़ी कंपनियों का कहना है कि ग्राहक जब अपने ब्रोकिंग अकाउंट में पैसा जोड़ता है तो उससे कंपनी को सीधे कोई कमाई नहीं होती, इसलिए उस पर MDR लागत लगाने को लेकर सवाल हैं. ऐसे में इंडस्ट्री ने रेगुलेटर्स के सामने ये मुद्दा उठाया है. पेमेंट इंडस्ट्री का तर्क है कि कई ऐसे ट्रांजैक्शन हैं जो क्रेडिट कार्ड से किए ही नहीं जा सकते. पहले ऐसे भुगतान नेट बैंकिंग, IMPS, NEFT और RTGS के जरिए होते थे. इसलिए UPI पर MDR लागू करने से पहले हर कैटेगरी के लिए साफ नियम जरूरी हैं. ऐसे में मांग की जा रही है कि फेस्टिव सीजन के बीच इसे लागू ना किया जाए. वहीं बैंक, एग्रीगेटर और कारोबारियों को तैयारी का समय मिलना चाहिए और जनवरी 2027 तक इसकी डेडलाइन बढ़ाने की मांग की गई है।




