जिले में कथित ‘सीजनल पत्रकारों’ की बाढ़ पत्रकारिता की आड़ में दबाव बनाने और अवैध वसूली की शिकायतें, वास्तविक पत्रकारों की साख भी हो रही प्रभावित

पत्रकारिता की आड़ में दबाव बनाने और अवैध वसूली की शिकायतें, वास्तविक पत्रकारों की साख भी हो रही प्रभावित

विशेष संवाददाता – के भारत न्यूज़

जिले में इन दिनों तथाकथित ‘सीजनल पत्रकारों’ की बढ़ती सक्रियता चर्चा का विषय बनी हुई है। त्योहार, धान खरीदी,चुनाव, निर्माण कार्य, टेंडर और अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियों के दौरान अचानक सक्रिय होने वाले कुछ लोग पत्रकारिता की पहचान का इस्तेमाल कर सरकारी कार्यालयों और मैदानी अमले पर अनावश्यक दबाव बनाने के आरोपों से घिरे हैं। इस स्थिति ने न केवल प्रशासनिक कामकाज को प्रभावित करने की आशंका पैदा की है, बल्कि वर्षों से निष्पक्ष और जिम्मेदार पत्रकारिता कर रहे वास्तविक मीडियाकर्मियों की प्रतिष्ठा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

गले में प्रेस आईडी कार्ड, वाहनों पर ‘प्रेस’ लिखी तख्तियां और हाथों में मोबाइल कैमरा लेकर घूमने वाले कुछ लोगों की कार्यशैली को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं। आरोप है कि इनमें से कुछ लोग जनहित के मुद्दों को सामने लाने के बजाय अधिकारियों और कर्मचारियों पर दबाव बनाने, छोटी-छोटी प्रक्रियात्मक त्रुटियों को बड़ा मुद्दा बताने और खबर प्रकाशित करने की धमकी देकर निजी हित साधने की कोशिश करते हैं। हालांकि, इन शिकायतों की निष्पक्ष जांच और तथ्यों का सत्यापन भी जरूरी है।

सरकारी कार्यालयों में अनावश्यक दखलंदाजी से कर्मचारी परेशान

जिले के तहसील, जनपद पंचायत, लोक निर्माण विभाग, स्वास्थ्य विभाग और खनिज विभाग सहित विभिन्न शासकीय कार्यालयों में इस तरह की गतिविधियों को लेकर असहजता का माहौल बताया जा रहा है। कर्मचारियों के अनुसार, कुछ लोग समूह में कार्यालय पहुंचकर अधिकारियों से अनावश्यक सवाल-जवाब करते हैं और दस्तावेजों की रिकॉर्डिंग करने या खबर प्रसारित करने की चेतावनी देकर दबाव बनाने का प्रयास करते हैं।

लोकतंत्र में पत्रकारों को सवाल पूछने और जनहित के मुद्दे उठाने का पूरा अधिकार है, लेकिन इस अधिकार की आड़ में किसी कर्मचारी को डराना, व्यक्तिगत लाभ के लिए दबाव बनाना या अनुचित मांग करना पत्रकारिता की मर्यादा के विपरीत है। ऐसी गतिविधियों के कारण अधिकारियों और कर्मचारियों का समय प्रभावित होता है तथा आम नागरिकों से जुड़े शासकीय कार्यों पर भी प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका रहती है।

चंद लोगों की हरकतों से वास्तविक पत्रकारिता की साख पर आंच

इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कुछ लोगों की कथित गैर-जिम्मेदाराना गतिविधियों का खामियाजा उन पत्रकारों को भुगतना पड़ रहा है, जो वर्षों से विपरीत परिस्थितियों में काम करते हुए जनसमस्याओं, प्रशासनिक खामियों और विकास कार्यों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते रहे हैं।

वास्तविक पत्रकारिता तथ्यों की पड़ताल, निष्पक्षता, जनहित और जवाबदेही पर आधारित होती है। पत्रकार का काम सत्ता और प्रशासन से सवाल पूछना है, न कि अपनी पहचान का इस्तेमाल कर किसी पर अनुचित दबाव बनाना। लेकिन जब पत्रकारिता के नाम पर व्यक्तिगत स्वार्थ साधने की शिकायतें सामने आती हैं, तो इससे पूरे मीडिया जगत की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। ऐसे में जरूरी है कि जिम्मेदार और अनुभवी पत्रकार स्वयं भी इस पेशे की गरिमा बनाए रखने के लिए आगे आएं।

पहचान और गतिविधियों की जांच की जरूरत

अब सवाल यह उठता है कि आखिर जिले में पत्रकारिता के नाम पर सक्रिय लोगों की पहचान और उनके कामकाज की वास्तविक स्थिति की जांच कौन करेगा? क्या संबंधित संस्थानों की ओर से जारी पहचान-पत्रों की वैधता की पड़ताल हो रही है? क्या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, यूट्यूब चैनलों और वेब पोर्टलों के नाम पर काम करने वाले लोगों की गतिविधियों पर कोई निगरानी है?

हालांकि, पत्रकारिता केवल किसी सरकारी मान्यता या पंजीयन तक सीमित नहीं है और डिजिटल माध्यमों पर काम करने वाले प्रत्येक पत्रकार को संदेह की नजर से देखना भी उचित नहीं होगा। लेकिन पत्रकारिता की आड़ में धमकी, ब्लैकमेलिंग अथवा अवैध वसूली की शिकायतों को गंभीरता से लिया जाना आवश्यक है।

जिला प्रशासन, पुलिस विभाग और संबंधित संस्थाओं को चाहिए कि ऐसी शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध धमकी, ब्लैकमेलिंग, अवैध वसूली या अन्य आपराधिक गतिविधियों के प्रमाण मिलते हैं, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। साथ ही वास्तविक पत्रकारों के सम्मान और स्वतंत्र पत्रकारिता के अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होनी चाहिए।

पत्रकारिता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसकी विश्वसनीयता निष्पक्षता, साहस और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता से बनती है, न कि गले में लटके किसी पहचान-पत्र या वाहन पर लिखे ‘प्रेस’ शब्द से। इसलिए जरूरी है कि पत्रकारिता की आड़ में अनुचित लाभ उठाने वालों और वास्तव में जनहित के लिए काम करने वाले पत्रकारों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित हो, ताकि कुछ लोगों की कथित गतिविधियों के कारण पूरे पत्रकारिता जगत की साख दांव पर न लगे।

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